वाक्यं तु यो नाद्रियतेऽनुशिष्टः प्रत्याह यश्चापि नियुज्यमानः ।
प्रज्ञाभिमानी प्रतिकूलवादी त्याज्यः स तादृक्त्वरयैव भृत्यः ॥
जो सेवक, स्वामी के आज्ञा देने पर, उनकी बात का आदर नहीं करता, किसी काम में लगाये जाने पर, इनकार कर जाता है, अपनी बुद्धि पर गर्व करने, और प्रतिकूल बोलने वाले, उस भूत्य को शीघ्र ही त्याग देना चाहिये।
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