यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्यस् तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।
मायाचारो मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युदेयः ॥
जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ वैसा ही वर्ताव करना चाहिये, यही नीति-धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ, कपट पूर्ण बर्ताव करे, और अच्छा बर्ताव करने वाले के साथ, साधु - भाव से ही बर्ताव करना चाहिये।
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