यस्तात न क्रुध्यति सर्वकालं भृत्यस्य भक्तस्य हिते रतस्य।
तस्मिन्भृत्या भर्तरि विश्वसन्ति न चैनमापत्सु परित्यजन्ति ॥
तात! जो स्वामि सदा हित साधन मे लगे रहने वाले, अपने भक्त सेवक पर कभी क्रोध नहीं करता, उस पर भूत्यगण विश्वास करते हैं, और उसे आपत्ति के समय भी नहीं छोड़ते।
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