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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 31
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपर्यन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च श्रुतं दमश्च । पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥
ये आठ गुण परुष की शोभा बढ़ाते हैं, बुद्धि, लीनता, शास्त्र ज्ञान, इन्द्रिय निम्रह, पराक्रम, अधिक न बोलने का स्वभाव, यथाशक्ति दान, और कतज्ञता।
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