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विदुर नीति • अध्याय 5 • श्लोक 43
भीष्मस्य कोपस्तव चेन्द्र कल्प द्रोणस्य राज्ञश्च युधिष्ठिरस्य । उत्सादयेल्लोकमिमं प्रवृद्धः श्वेतो ग्रहस्तिर्यगिवापतन्खे ॥
इन्द्र के समान पराक्रमी महाराज! आकाश मे तिरछा उदित हुआ धूमकेतु, जैसे सारे संसार में अशान्ति, और उपद्रव खड़ी कर देता है, उसी तरह भीष्म, आप, द्रोणाचार्य, और राजा युधिष्टिर का बढ़ा हुआ कोप, इस संसार का संहार कर सकता है।
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