मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 1 — आनन्दलहरी

सौन्दर्यलहरी
42 श्लोक • केवल अनुवाद
शक्ति से युक्त होकर ही शिव प्रपञ्च की सृष्टि कर सकता है अन्यथा वह हिल भी नहीं सकता। ऐसी दशा में विष्णु, महादेव और ब्रह्मादि तक से पूजित तुझको भला मुझ जैसा पुण्यहीन कैसे स्तुति और नमस्कार से प्रसन्न करे।
ब्रह्मा ने तुम्हारे चरणकमल के धूलिकणों से ही लोकों की सृष्टि की है। विष्णु इन लोकों को किसी प्रकार अर्थात् अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से अपने हजार शिरों पर रखे हैं। और शिव ने इनको भस्मसात् कर उसकी भस्म से अपने शरीर को धूसरित कर रखा है।
तुम अज्ञानियों के अज्ञानरूपी अन्धकार के नाश करनेवाले ज्ञानरूपी सूर्य हो। तुम बुद्धिहीनों की चैतन्यतारूपी मधु, बहानेवाली धारा हो । तुम दरिद्रों की चिन्तामणि की माला की मणि और भवसागर में डूबे हुए मुर राक्षस के शत्रु वराह भगवान् की दंष्ट्रा (दाँत) हो।
तेरे सिवा और सभी देवतागण हाथों से रक्षा करते हैं और वर देते हैं। तुम्ही एक प्रकाश्य रूप से अभय और वर देने की चेष्टा दिखानेवाली नहीं हो, कारण हे जीवों की शरणदायिनी, तुम्हारे दोनों चरण ही भय से रक्षा और कामनाओं की अधिक मात्रा में पूर्ति करने में समर्थ हैं।
शरणागतों को सौभाग्य देनेवाली तुझको पूर्वकाल में हरि ने आराधना से सन्तुष्ट कर स्त्री का रूप धारण कर त्रिपुरनाशक शिव को भी मोहित कर लिया था। स्मर अर्थात् कामदेव भी तुमको नमस्कार कर रति को लुभानेवाले रूप से मुनियों के भी मन को मोह लेता है।
हे हिमालयकन्थे! भ्रमरों की ताँतवाला पुष्प-धनुष और पाँच कुसुम-शर लिये बसन्त-द्वारा चालित मलयवायु के रथ पर बैठा अशरीरवान् कामदेव तुम्हारे कृपाकटाक्ष के प्रताप से ही इस संसार को विजय करता है।
शिव की पुरुषार्थस्वरूपा नन्हीं घण्टिकाओं से भूषित पतली कमरवाली, हाथी के बच्चे के पुष्ट ललाट के समान सुपुष्ट, स्तनवाली और शरद ऋतु के पूर्णचन्द्र-समान कान्तिवाली, हाथों में धनुष, वाण, पाश और अंकुश लिये भगवती हम लोगों के सामने आवे।
थोड़े से ही भाग्यवान् हैं, जो चित और आनन्द की धारारूपिणी, अमृत-सागर के मध्य में मणि द्वीप में अलौकिक वृक्षों के उद्यान से वेष्टित और नीपवृक्षों के उपवन से युक्त चिन्तामणि गृह में परम शिवरूपी पलंग पर (जिसके चार शिव आधारस्वरूप हैं) बैठी हुई तुमको भजते हैं।
(हे देवि) तुम मूलाधार में पृथ्वी को, स्वाधिष्ठान में अग्नि को, मणिपुर में जल को, हृदय (अनाहत ) में वायु को, इसके ऊपर ( विशुद्धि में ) आकाश को, भ्रूमध्य (आज्ञाचक्र) में मन को-इस प्रकार सम्पूर्ण कुलमार्ग को भेदकर सहस्रार में सूक्ष्मभाव से अपने पति के साथ रमण करती हो।
तब तुम पुनः अपने पदयुगल से बहती अमृतधारा से शरीर को सींचती हुई वलयाकार सर्प के समान अपने वास्तविक रूप को धारण कर अपने मूल निवासस्थान कुल-कुण्ड में सोती हो।
चार श्रीकण्ठों (शिव) शम्भु नौ प्रकृति रूप से पाँच युवतियों (शिव) तेरा बासस्थान से बना है। कोणों की संख्य तेंतालिस(४३) है। इसकी तीन वृत्तियाँ, तीन रेखायें और आठ सोलह तथा दल वाले क्रमश: दो कमल (चक्र) हैं।
हे हिमगिरिसुते! ब्रह्मादि देव तुम्हारी सुन्दरता का पूर्ण अनुभव न कर पा किसी प्रकार कल्पना कर लेते हैं। देवस्त्रियाँ तुम्हारी अलौकिक सुन्दरता के ध्यान से अज्ञानियों को दुष्प्राप्य शिव-सामरस्यावस्था को प्राप्त करती हैं।
जिनके केश खुले हैं, कुम्भ-सदृश जिनके बड़े-बड़े स्तनों पर से ऊर्ध्ववस्त्र हट गया है और काञ्ची टूट जाने से जिनका अधोवस्त्र गिर गया है, ऐसी सैकड़ों युवतियां उस बूढ़े के पीछे दौड़ती हैं, जिस पर तुम्हारा एक कटाक्ष भी पड़ जाता है यद्यपि आयुवृद्धि-वश वह आँख से रहित और प्रेमरस के अयोग्य हो गया है।
हे माता! पृथ्वी की छप्पन, जल की बावन, अग्नि की बासठ, वायु की चौवन, आकाश की बहत्तर और मन की चौंसठ किरणे हैं परन्तु तुम्हारे दोनों पद-कमल इन सबके ऊपर हैं।
कविगण यदि शरदऋतु की चाँदनी-जैसी निर्मला, जटाजूट पर चन्द्रवाली, चारों हाथों में वर, अभय, स्फटिकमाला और पुस्तक लिए तुम्हारा अभिवादन और मनन न कर लिया करें तो उनकी रचना मधु, दुग्ध और द्राक्षा (अंगूर) के समान मधुर कैसे हो?
बड़े-बड़े कवियों के हृदय-कमल को विकसित करती हुई उदयकालिक सूर्य के समान सुन्दर लाल वर्णवाली तुम्हारा जो विद्वान् भजन करते हैं, वे अपने गम्भीर शब्दरूपी सरस्वती की शृङ्गारलहरी से सबके मन प्रसन्न करते हैं।
चन्द्रमणि के समान सुन्दर और वाक्शक्ति की देनेवाली वशिनी आदि शक्तियों-सहित तुम्हारा जो सम्यक् चिन्तन करता है, वह सरस्वती के मुख-कमल की सुगन्ध से मधुर वाक्यवाले काव्यों का रचयिता होता है।
उदयकालीन सूर्य के वर्ण के समान लाल रंग के तुम्हारे पृथ्वी-स्वर्गमय शरीर का जो स्मरण करता है, वह जंगली हरिण के चञ्चल नेत्रवत् चपल नेत्रवाली उर्वशी आदि स्वर्गीय अप्सराओं को भी वश में कर लेता है।
हे हरमहिषि! विन्दु से मुख, उसके नीचे स्तनद्वय और हकार के अर्द्ध से निग्न अंग इस प्रकार कल्पना कर जो तुम्हारी काम-कला का चिन्तन करता है, वह तुरन्त स्त्रियों को चंचल कर देता है। परन्तु यह उसके हेतु अति तुच्छ है कारण वह चन्द्र और सूर्यरूप स्तन-युगल वाले त्रिलोकों को भी अपनी इच्छा पर ही विचलित कर सकता है।
अमृतधारारूपी किरणों को फैलाते हुए हिमालय पर्वत के सदृश तुम्हारे रूप का जो हृदय में ध्यान करता है, वह सर्पों का अभिमान गरुड़वत् दूर करता है और अपनी शीतल सुधादृष्टि से ज्वरपीड़ित को सुख देता है।
विद्युत्-रेखा के सदृश सूक्ष्म रूप से छहों कमलों (चक्रों) के ऊपर बड़े कमलों (सहस्रदल) के वन में स्थित सूर्य, चन्द्र और अग्निमयी तुम्हारी कला को अनायास देखते हुए मायारहित महान् पुरुष सर्वोत्कृष्ट आनन्द-लहरी में अवगाहन करते हैं।
हे भवानि! तू मुझ दास पर कृपादृष्टि दान कर। तुम्हारे चरणों का नीराजन विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र के तेजोमय मुकुटों से होता है और जो तुझे भवानी कहकर पुकारता है, उसको तुम तत्काल अपने में मिला लेती हो।
ऐसी शंका होती है कि शम्भु के आधे शरीर का हरण करने से सन्तुष्ट न होकर तुमने बचे हुए आधे हिस्से को भी ले लिया है, जिससे तुम्हारा शरीर लाल है, आँखें तीन हैं, कुचयुगल से झुकी हो और टेढ़ा चन्द्र तुम्हारा मुकुट है।
तुम्हारे क्षणकालिक कटाक्षरूपी आशावश ब्रह्मा विश्व की सृष्टि, विष्णु इसका पालन और रुद्र इसका संहार करते हैं। ईश (ईश्वर) हन (क्रियाओं को) को तुच्छ समझकर निश्चल है और सदाशिव सबको अपने में लय कर लेता है।
हे शिवे! तुम्हारे चरण-युगल की पूजा ही सत्व, रज और तमोगुणों से सृष्ट तीनों देवों की पूजा है। (कारण) ये उच्च मुकुटवाले (देव) हाथ जोड़े तुम्हारे पाँव रखने की मणियों की बनी चौकी के समीप खड़े हैं।
हे सती! तुम्हारे पति मात्र महाप्रलय के समय में रहते हैं, जिनके साथ तुम विहार करती हो और सभी ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर आदि मर जाते हैं। निरालस्य आँखोंवाले इन्द्र भी अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं अर्थात् मर जाते हैं।
हे माता! इस संसार में ब्रह्मा और सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्र आदि स्वर्ग के रहनेवाले देवगण बुढ़ापे और मरण को हरनेवाली सुधा (अमृत) को पीकर भी मर जाते हैं। परन्तु शिव कालकूट विष पीकर भी नहीं मरे, इसका कारण तुम्हारे कर्णाभूषणों की महिमा है।
हे माता! मेरे सभी वाक्य जप हों; मेरे हाथों की सभी क्रियायें मुद्रायें हों; मेरे चरणों की सारी गतियाँ प्रदक्षिणा हों; मेरे भोजनादि हवन की आहुतियाँ हों; मेरी नमस्कार-क्रियायें तुममें तादात्म्यखरूप (ऐक्यसूचक) हों; मेरे सभी सुख अखिल आत्मा में समर्पित हों और जो कुछ भी मैं करूँ, सब तुम्हारी पूजा में ही परिगणित हो।
जब कि ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र दंडवत् पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं, भव अर्थात् शिव के तुम्हारे निकट हठात् आने पर उनके स्वागतार्थ तुम्हारे खड़े होने के समय सखियाँ तुम्हें सचेत करने को इन तीनों की विजय का बखान करती हुई कहती हैं कि ब्रह्मा और जम्भ राक्षस के मारनेवाले इन्द्र के मुकुटों से बचना और देखो कहीं कैटभ के मारनेवाले विष्णु के कठोर मुकुट पर न गिर पड़ो।
हे सेवा करने के योग्य वरेण्ये नित्ये! अपने देह से निकलने वाली अणिमादि सिद्धियों रूपी किरणों से घिरा हुआ तेरा भक्त जो त्वां अहम् अर्थात् तुझकों अपना ही रूप मानकर सदा भावना करता है, त्रिनयन की समृद्धि को भी तृणवत् तुच्छ समझने वाले उस साधक की संवर्ताग्नि आरती उतारता है, इसमें क्या आश्चर्य है?
पशुपति वा शिव चौंसठ तन्त्रों का अनुसन्धान अर्थात् मनन कर प्रत्येक तन्त्र से प्रतिपादित तत्तत् सिद्धियाँ प्राप्त कर स्वाधीन हो गये, परन्तु तुम्हारी आज्ञावश वह पृथ्वी पर पुनः पुरुषार्थ-चतुष्टय के एकमात्र प्रतिपादक ‘स्वतन्त्र’ तन्त्र को ले आये।
हे माता! प्रत्येक कूट के अन्तःस्थित हृल्लेखा अर्थात् ‘ह्रीं के ये वर्ण तुम्हारे नाम और रूप हैं। ये हैं शिव, शक्ति और काम; तब रवि, शीतकिरण, स्मर, हंस और शक्र; तब परा, मार और हरि।
हे नित्ये! हे अद्वितीये! मोक्ष और भोग अर्थात् ऐहिक तथा परम सुख के चाहनेवाले जो साधक स्मर, योनि और लक्ष्मीवीजों को तुम्हारे मन्त्र में योजित करके जपते हैं और शिवाग्नि अर्थात् सम्बिदग्नि वा कुण्डली-विमुक्त (मूलाधार-स्थित) स्वयम्भूलिंग में सुगन्धित घृत-धारा की सौ बार आहुति देते हैं, वे शब्दब्रह्म में लय होते हैं अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाते हैं।
तुम सूर्य और चन्द्ररूपी स्तनद्वय से युक्त शम्भु की शरीर हो। हे भगवती! तुम निष्पाप अर्थात् निर्विकार हो; इस हेतु तुम्हारी निःशेषता वा सर्वांशता और शेषता वा असम्पूर्णता वा अंशता में परस्पर-सम्बन्ध का युक्तानन्द कैवल्यानन्दरूप से है।
हे शिवयुवती! तुम मन, आकाश, वायु की सारथी अर्थात् अग्नि, जल और पृथ्वी हो। इस प्रकार तुम अपने को विश्वरूप में परिणत करती हो। तुमसे पर अर्थात् अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अपनी लीला से तुम अपने विश्वरूप में चैतन्यता एवं आनन्द का विकाश करती हो।
मैं तुम्हारी नृत्य-निपुणा समया शक्ति (सावित्री) के सङ्ग शिवरूप ब्रह्मा की मूलाधार में वन्दना करता हूँ। यह शिव नवरस के प्रकाशक महानृत्य में कुशल हैं। इन दोनों से माता-पितामय यह संसार अपने विभव-सहित उन दोनों के संयुक्त उद्देश्य की संयुक्त सहायता से पूर्त होने के निमित्त तुम्हारी दया से सृष्ट हुआ है।
हे माता! मैं उनकी (रुद्र की) वन्दना करता हूँ, जो स्वाधिष्ठान (चक्र) सम्वर्तरूपी अग्नि के रूप में सर्वदा रहते हैं। मैं महतीशक्ति समया की भी स्तुति करता हूँ। जब (रुद्र) अपने क्रोधयुक्त नेत्रों की अग्निज्वाला से संसार को दग्ध करते हैं तब तुम्हीं अपनी दयादृष्टि से इसको शीतल करती हो।
मणिपुरवासी और कामरूपी सूर्य-द्वारा तप्त तीनों लोकों पर अमृत वर्षा करनेवाले, कृष्ण मेघ के सदृश काले, अकथनीय विष्णु की मैं उनकी शक्ति (नारायणी) सहित भक्ति करता हूँ, जो उनको अपनी अन्धकारनाशक ज्योति से उसी प्रकार विभूषित करती है, जिस प्रकार विद्युल्लता से मेघ शोभित होता है।
अनाहत कमल में मैं महत्पुरुषों के मनों में फिरनेवाले और विकसित कमल के ज्ञानरूपी पराग के रस को चखनेवाले हं-स: की जोड़ी का भजन करता हूँ। इस मनन से साधक अठारहों विद्याओं का ज्ञाता होता है और नीर-क्षीर-विवेक के सदृश दोष और गुण की पहचान की सामर्थ्य पा जाता है।
मैं आकाश-सदृश विशुद्धिचक्र में स्वच्छ स्फटिक पत्थर के समान विशुद्ध शिव और साथ ही उन्हीं के समान कार्यशालिनी देवी को नमस्कार करता हूँ। संसार उनकी कान्ति से अन्धकार वा अज्ञान के दूर हो जाने से चन्द्र की ज्योत्स्ना से आनन्दित चकोरी पक्षी के सदृश आनन्दित होता है।
मैं तुम्हारे आज्ञाचक्रस्थित पराचित्शक्ति से युक्त और कोटि चन्द्रमाओं और सूर्यों के सदृश ज्योतिवाले पर-शम्भु की वन्दना करता हूँ। सूर्य, चन्द्र और अग्नि के प्रकाशों से बहुत परे प्रकाशस्थान के रहनेवाले लोग इनकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। प्रकाश के उस स्थान में प्रकाश की आवश्यकता नहीं है।
इसी पद्य तक आनन्दलहरी का वर्णन है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें