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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 14
क्षितौ षट्पञ्चाशद् द्विसमधिकपञ्चाशदुदके हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपञ्चाशदनिले । दिवि द्विष्षट्त्रिंशन्मनसि च चतुष्षष्टिरिति ये मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥
हे माता! पृथ्वी की छप्पन, जल की बावन, अग्नि की बासठ, वायु की चौवन, आकाश की बहत्तर और मन की चौंसठ किरणे हैं परन्तु तुम्हारे दोनों पद-कमल इन सबके ऊपर हैं।
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