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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 18
तनुच्छायाभिस्ते तरुणतरणिश्रीसरणिभिः दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनि मग्नां स्मरति यः । भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीननयनाः सहोर्वश्या वश्याः कति कति न गीर्वाणगणिकाः ॥
उदयकालीन सूर्य के वर्ण के समान लाल रंग के तुम्हारे पृथ्वी-स्वर्गमय शरीर का जो स्मरण करता है, वह जंगली हरिण के चञ्चल नेत्रवत् चपल नेत्रवाली उर्वशी आदि स्वर्गीय अप्सराओं को भी वश में कर लेता है।
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