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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 30
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभितो निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः । किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥
हे सेवा करने के योग्य वरेण्ये नित्ये! अपने देह से निकलने वाली अणिमादि सिद्धियों रूपी किरणों से घिरा हुआ तेरा भक्त जो त्वां अहम् अर्थात् तुझकों अपना ही रूप मानकर सदा भावना करता है, त्रिनयन की समृद्धि को भी तृणवत् तुच्छ समझने वाले उस साधक की संवर्ताग्नि आरती उतारता है, इसमें क्या आश्चर्य है?
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