त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात् त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥
तेरे सिवा और सभी देवतागण हाथों से रक्षा करते हैं और वर देते हैं। तुम्ही एक प्रकाश्य रूप से अभय और वर देने की चेष्टा दिखानेवाली नहीं हो, कारण हे जीवों की शरणदायिनी, तुम्हारे दोनों चरण ही भय से रक्षा और कामनाओं की अधिक मात्रा में पूर्ति करने में समर्थ हैं।
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