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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 6
धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकरमयी पञ्च विशिखाः वसन्तः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः । तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते कामपि कृपाम् अपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिद-मनङ्गो विजयते ॥
हे हिमालयकन्थे! भ्रमरों की ताँतवाला पुष्प-धनुष और पाँच कुसुम-शर लिये बसन्त-द्वारा चालित मलयवायु के रथ पर बैठा अशरीरवान् कामदेव तुम्हारे कृपाकटाक्ष के प्रताप से ही इस संसार को विजय करता है।
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