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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 21
तटिल्लेखातन्वीं तपनशशिवैश्वानरमयीं निषण्णां षण्णामप्युपरि कमलानां तव कलाम् । महापद्माटव्यां मृदितमलमायेन मनसा महान्तः पश्यन्तो दधति परमाह्लादलहरीम् ॥
विद्युत्-रेखा के सदृश सूक्ष्म रूप से छहों कमलों (चक्रों) के ऊपर बड़े कमलों (सहस्रदल) के वन में स्थित सूर्य, चन्द्र और अग्निमयी तुम्हारी कला को अनायास देखते हुए मायारहित महान् पुरुष सर्वोत्कृष्ट आनन्द-लहरी में अवगाहन करते हैं।
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