हे हरमहिषि! विन्दु से मुख, उसके नीचे स्तनद्वय और हकार के अर्द्ध से निग्न अंग इस प्रकार कल्पना कर जो तुम्हारी काम-कला का चिन्तन करता है, वह तुरन्त स्त्रियों को चंचल कर देता है। परन्तु यह उसके हेतु अति तुच्छ है कारण वह चन्द्र और सूर्यरूप स्तन-युगल वाले त्रिलोकों को भी अपनी इच्छा पर ही विचलित कर सकता है।
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