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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 24
जगत्सूते धाता हरिरवति रुद्रः क्षपयते तिरस्कुर्वन्नेतत्स्वमपि वपुरीशस्तिरयति । सदापूर्वः सर्वं तदिदमनुगृह्णाति च शिव- स्तवाज्ञामालम्ब्य क्षणचलितयोर्भ्रूलतिकयोः ॥
तुम्हारे क्षणकालिक कटाक्षरूपी आशावश ब्रह्मा विश्व की सृष्टि, विष्णु इसका पालन और रुद्र इसका संहार करते हैं। ईश (ईश्वर) हन (क्रियाओं को) को तुच्छ समझकर निश्चल है और सदाशिव सबको अपने में लय कर लेता है।
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