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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 40
विशुद्धौ ते शुद्धस्फटिकविशदं व्योमजनकं शिवं सेवे देवीमपि शिवसमानव्यवसिताम् । ययोः कान्त्या यान्त्याः शशिकिरणसारूप्यसरणे- विधूतान्तर्ध्वान्ता विलसति चकोरीव जगती ॥
मैं आकाश-सदृश विशुद्धिचक्र में स्वच्छ स्फटिक पत्थर के समान विशुद्ध शिव और साथ ही उन्हीं के समान कार्यशालिनी देवी को नमस्कार करता हूँ। संसार उनकी कान्ति से अन्धकार वा अज्ञान के दूर हो जाने से चन्द्र की ज्योत्स्ना से आनन्दित चकोरी पक्षी के सदृश आनन्दित होता है।
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