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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 2
तनीयांसं पांसुं तव चरणपङ्केरुहभवं विरिञ्चिस्सञ्चिन्वन् विरचयति लोकानविकलम् । वहत्येनं शौरिः कथमपि सहस्रेण शिरसां हरस्संक्षुद्यैनं भजति भसितोद्धूलनविधिम् ॥
ब्रह्मा ने तुम्हारे चरणकमल के धूलिकणों से ही लोकों की सृष्टि की है। विष्णु इन लोकों को किसी प्रकार अर्थात् अपने सम्पूर्ण सामर्थ्य से अपने हजार शिरों पर रखे हैं। और शिव ने इनको भस्मसात् कर उसकी भस्म से अपने शरीर को धूसरित कर रखा है।
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