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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 33
स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो- र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः । भजन्ति त्वां चिन्तामणिगुननिबद्धाक्षवलयाः शिवाग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराहुतिशतैः ॥
हे नित्ये! हे अद्वितीये! मोक्ष और भोग अर्थात् ऐहिक तथा परम सुख के चाहनेवाले जो साधक स्मर, योनि और लक्ष्मीवीजों को तुम्हारे मन्त्र में योजित करके जपते हैं और शिवाग्नि अर्थात् सम्बिदग्नि वा कुण्डली-विमुक्त (मूलाधार-स्थित) स्वयम्भूलिंग में सुगन्धित घृत-धारा की सौ बार आहुति देते हैं, वे शब्दब्रह्म में लय होते हैं अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाते हैं।
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