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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 34
शरीरं त्वं शम्भोः शशिमिहिरवक्षोरुहयुगं तवात्मानं मन्ये भगवति नवात्मानमनघम् । अतश्शेषश्शेषीत्ययमुभयसाधारणतया स्थितः संबन्धो वां समरसपरानन्दपरयोः ॥
तुम सूर्य और चन्द्ररूपी स्तनद्वय से युक्त शम्भु की शरीर हो। हे भगवती! तुम निष्पाप अर्थात् निर्विकार हो; इस हेतु तुम्हारी निःशेषता वा सर्वांशता और शेषता वा असम्पूर्णता वा अंशता में परस्पर-सम्बन्ध का युक्तानन्द कैवल्यानन्दरूप से है।
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