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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 28
जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचना गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः । प्रणामस्संवेशस्सुखमखिलमात्मार्पणदृशा सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥
हे माता! मेरे सभी वाक्य जप हों; मेरे हाथों की सभी क्रियायें मुद्रायें हों; मेरे चरणों की सारी गतियाँ प्रदक्षिणा हों; मेरे भोजनादि हवन की आहुतियाँ हों; मेरी नमस्कार-क्रियायें तुममें तादात्म्यखरूप (ऐक्यसूचक) हों; मेरे सभी सुख अखिल आत्मा में समर्पित हों और जो कुछ भी मैं करूँ, सब तुम्हारी पूजा में ही परिगणित हो।
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