मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 3
अविद्यानामन्त-स्तिमिर-मिहिरद्वीपनगरी जडानां चैतन्य-स्तबक-मकरन्द-स्रुतिझरी । दरिद्राणां चिन्तामणिगुणनिका जन्मजलधौ निमग्नानां दंष्ट्रा मुररिपु-वराहस्य भवति ॥
तुम अज्ञानियों के अज्ञानरूपी अन्धकार के नाश करनेवाले ज्ञानरूपी सूर्य हो। तुम बुद्धिहीनों की चैतन्यतारूपी मधु, बहानेवाली धारा हो । तुम दरिद्रों की चिन्तामणि की माला की मणि और भवसागर में डूबे हुए मुर राक्षस के शत्रु वराह भगवान् की दंष्ट्रा (दाँत) हो।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सौन्दर्यलहरी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सौन्दर्यलहरी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें