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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 9
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि । मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥
(हे देवि) तुम मूलाधार में पृथ्वी को, स्वाधिष्ठान में अग्नि को, मणिपुर में जल को, हृदय (अनाहत ) में वायु को, इसके ऊपर ( विशुद्धि में ) आकाश को, भ्रूमध्य (आज्ञाचक्र) में मन को-इस प्रकार सम्पूर्ण कुलमार्ग को भेदकर सहस्रार में सूक्ष्मभाव से अपने पति के साथ रमण करती हो।
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