मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 10
सुधाधारासारैश्चरणयुगलान्तर्विगलितैः प्रपञ्चं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नायमहसः । अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥
तब तुम पुनः अपने पदयुगल से बहती अमृतधारा से शरीर को सींचती हुई वलयाकार सर्प के समान अपने वास्तविक रूप को धारण कर अपने मूल निवासस्थान कुल-कुण्ड में सोती हो।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सौन्दर्यलहरी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सौन्दर्यलहरी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें