तब तुम पुनः अपने पदयुगल से बहती अमृतधारा से शरीर को सींचती हुई वलयाकार सर्प के समान अपने वास्तविक रूप को धारण कर अपने मूल निवासस्थान कुल-कुण्ड में सोती हो।
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