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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 17
सवित्रीभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभिः वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः । स कर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गिरुचिभिः वचोभिर्वाग्देवीवदनकमलामोदमधुरैः ॥
चन्द्रमणि के समान सुन्दर और वाक्शक्ति की देनेवाली वशिनी आदि शक्तियों-सहित तुम्हारा जो सम्यक् चिन्तन करता है, वह सरस्वती के मुख-कमल की सुगन्ध से मधुर वाक्यवाले काव्यों का रचयिता होता है।
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