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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 16
कवीन्द्राणां चेतःकमलवनबालातपरुचिं भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् । विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतरश्रृङ्गारलहरी- गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां रञ्जनममी ॥
बड़े-बड़े कवियों के हृदय-कमल को विकसित करती हुई उदयकालिक सूर्य के समान सुन्दर लाल वर्णवाली तुम्हारा जो विद्वान् भजन करते हैं, वे अपने गम्भीर शब्दरूपी सरस्वती की शृङ्गारलहरी से सबके मन प्रसन्न करते हैं।
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