किरन्तीमङ्गेभ्यः किरणनिकुरम्बामृतरसं
हृदि त्वामाधत्ते हिमकरशिलामूर्तिमिव यः ।
स सर्पाणां दर्पं शमयति शकुन्ताधिप इव
ज्वरप्लुष्टान् दृष्ट्या सुखयति सुधाधारसिरया ॥
अमृतधारारूपी किरणों को फैलाते हुए हिमालय पर्वत के सदृश तुम्हारे रूप का जो हृदय में ध्यान करता है, वह सर्पों का अभिमान गरुड़वत् दूर करता है और अपनी शीतल सुधादृष्टि से ज्वरपीड़ित को सुख देता है।
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