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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 37
तव स्वाधिष्ठाने हुतवहमधिष्ठाय निरतं तमीडे संवर्तं जननि महतीं तां च समयाम् । यदालोके लोकान् दहति महति क्रोधकलिते दयार्द्रा या दृष्टिः शिशिरमुपचारं रचयति ॥
हे माता! मैं उनकी (रुद्र की) वन्दना करता हूँ, जो स्वाधिष्ठान (चक्र) सम्वर्तरूपी अग्नि के रूप में सर्वदा रहते हैं। मैं महतीशक्ति समया की भी स्तुति करता हूँ। जब (रुद्र) अपने क्रोधयुक्त नेत्रों की अग्निज्वाला से संसार को दग्ध करते हैं तब तुम्हीं अपनी दयादृष्टि से इसको शीतल करती हो।
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