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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 23
त्वया हृत्वा वामं वपुरपरितृप्तेन मनसा शरीरार्धं शम्भोरपरमपि शङ्के हृतमभूत् । यदेतत्त्वद्रूपं सकलमरुणाभं त्रिनयनं कुचाभ्यामानम्रं कुटिलशशिचूडालमकुटम् ॥
ऐसी शंका होती है कि शम्भु के आधे शरीर का हरण करने से सन्तुष्ट न होकर तुमने बचे हुए आधे हिस्से को भी ले लिया है, जिससे तुम्हारा शरीर लाल है, आँखें तीन हैं, कुचयुगल से झुकी हो और टेढ़ा चन्द्र तुम्हारा मुकुट है।
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