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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 31
चतुष्षष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसंधाय भुवनं स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः । पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना- स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥
पशुपति वा शिव चौंसठ तन्त्रों का अनुसन्धान अर्थात् मनन कर प्रत्येक तन्त्र से प्रतिपादित तत्तत् सिद्धियाँ प्राप्त कर स्वाधीन हो गये, परन्तु तुम्हारी आज्ञावश वह पृथ्वी पर पुनः पुरुषार्थ-चतुष्टय के एकमात्र प्रतिपादक ‘स्वतन्त्र’ तन्त्र को ले आये।
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