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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 7
क्वणत्काञ्चीदामा करिकलभकुम्भस्तननता परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्रवदना । धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधाना करतलैः पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहोपुरुषिका ॥
शिव की पुरुषार्थस्वरूपा नन्हीं घण्टिकाओं से भूषित पतली कमरवाली, हाथी के बच्चे के पुष्ट ललाट के समान सुपुष्ट, स्तनवाली और शरद ऋतु के पूर्णचन्द्र-समान कान्तिवाली, हाथों में धनुष, वाण, पाश और अंकुश लिये भगवती हम लोगों के सामने आवे।
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