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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 5
हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् । स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥
शरणागतों को सौभाग्य देनेवाली तुझको पूर्वकाल में हरि ने आराधना से सन्तुष्ट कर स्त्री का रूप धारण कर त्रिपुरनाशक शिव को भी मोहित कर लिया था। स्मर अर्थात् कामदेव भी तुमको नमस्कार कर रति को लुभानेवाले रूप से मुनियों के भी मन को मोह लेता है।
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