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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 39
समुन्मीलत् संवित् कमलमकरन्दैकरसिकं भजे हंसद्वन्द्वं किमपि महतां मानसचरम् । यदालापादष्टादशगुणितविद्यापरिणति- र्यदादत्ते दोषाद् गुणमखिलमद्भ्यः पय इव ॥
अनाहत कमल में मैं महत्पुरुषों के मनों में फिरनेवाले और विकसित कमल के ज्ञानरूपी पराग के रस को चखनेवाले हं-स: की जोड़ी का भजन करता हूँ। इस मनन से साधक अठारहों विद्याओं का ज्ञाता होता है और नीर-क्षीर-विवेक के सदृश दोष और गुण की पहचान की सामर्थ्य पा जाता है।
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