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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 27
सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरिणीं विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः । करालं यत्क्ष्वेलं कबलितवतः कालकलना न शम्भोस्तन्मूलं तव जननि ताटङ्कमहिमा ॥
हे माता! इस संसार में ब्रह्मा और सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्र आदि स्वर्ग के रहनेवाले देवगण बुढ़ापे और मरण को हरनेवाली सुधा (अमृत) को पीकर भी मर जाते हैं। परन्तु शिव कालकूट विष पीकर भी नहीं मरे, इसका कारण तुम्हारे कर्णाभूषणों की महिमा है।
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