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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 29
किरीटं वैरिञ्चं परिहर पुरः कैटभभिदः कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् । प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥
जब कि ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र दंडवत् पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं, भव अर्थात् शिव के तुम्हारे निकट हठात् आने पर उनके स्वागतार्थ तुम्हारे खड़े होने के समय सखियाँ तुम्हें सचेत करने को इन तीनों की विजय का बखान करती हुई कहती हैं कि ब्रह्मा और जम्भ राक्षस के मारनेवाले इन्द्र के मुकुटों से बचना और देखो कहीं कैटभ के मारनेवाले विष्णु के कठोर मुकुट पर न गिर पड़ो।
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