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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 15
शरज्ज्योत्स्नाशुद्धां शशियुतजटाजूटमकुटां वरत्रासत्राणस्फटिकघटिकापुस्तककराम् । सकृन्न त्वा नत्वा कथमिव सतां संन्निदधते मधुक्षीरद्राक्षामधुरिमधुरीणाः भणितयः ॥
कविगण यदि शरदऋतु की चाँदनी-जैसी निर्मला, जटाजूट पर चन्द्रवाली, चारों हाथों में वर, अभय, स्फटिकमाला और पुस्तक लिए तुम्हारा अभिवादन और मनन न कर लिया करें तो उनकी रचना मधु, दुग्ध और द्राक्षा (अंगूर) के समान मधुर कैसे हो?
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