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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 13
नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः । गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया हठात् त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥
जिनके केश खुले हैं, कुम्भ-सदृश जिनके बड़े-बड़े स्तनों पर से ऊर्ध्ववस्त्र हट गया है और काञ्ची टूट जाने से जिनका अधोवस्त्र गिर गया है, ऐसी सैकड़ों युवतियां उस बूढ़े के पीछे दौड़ती हैं, जिस पर तुम्हारा एक कटाक्ष भी पड़ जाता है यद्यपि आयुवृद्धि-वश वह आँख से रहित और प्रेमरस के अयोग्य हो गया है।
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