हे माता! प्रत्येक कूट के अन्तःस्थित हृल्लेखा अर्थात् ‘ह्रीं के ये वर्ण तुम्हारे नाम और रूप हैं। ये हैं शिव, शक्ति और काम; तब रवि, शीतकिरण, स्मर, हंस और शक्र; तब परा, मार और हरि।
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