हे शिवयुवती! तुम मन, आकाश, वायु की सारथी अर्थात् अग्नि, जल और पृथ्वी हो। इस प्रकार तुम अपने को विश्वरूप में परिणत करती हो। तुमसे पर अर्थात् अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अपनी लीला से तुम अपने विश्वरूप में चैतन्यता एवं आनन्द का विकाश करती हो।
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