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सौन्दर्यलहरी • अध्याय 1 • श्लोक 41
तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता । यमाराध्यन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये निरालोकेऽलोके निवसति हि भालोकभवने ॥
मैं तुम्हारे आज्ञाचक्रस्थित पराचित्शक्ति से युक्त और कोटि चन्द्रमाओं और सूर्यों के सदृश ज्योतिवाले पर-शम्भु की वन्दना करता हूँ। सूर्य, चन्द्र और अग्नि के प्रकाशों से बहुत परे प्रकाशस्थान के रहनेवाले लोग इनकी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। प्रकाश के उस स्थान में प्रकाश की आवश्यकता नहीं है।
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