मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें

अध्याय 87 — अथ शाकुनेऽन्तरचक्राध्यायः

बृहत्संहिता
45 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि पूर्व दिशा में स्थित शकुन कोलाहल करे तो राजा के आश्रित पुरुष का आगमन तथा पूजा-लाभार्थ मणि और रत्नों की प्राप्ति को सूचित करता है। यदि वह शकुन शुभ हो तो उत्तम फल, मध्यम हो तो नध्यम फल और अशुभ हो तो किञ्चित् शुभ फल प्रदान करता है।
पूर्व दिशा के बाद प्रदक्षिणक्रम से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो सोने की प्राप्ति और अभीष्ट अर्थ को सिद्धि होती है। यदि तृतीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो शख, घन और सुपारी की प्राप्ति होती है।
चतुर्थ भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो पवित्र ब्राह्मण और अग्निहोत्री का दर्शन होता है। आग्नेय कोण में स्थित शकुन कोलाहल करे तो सुवर्ण और लोह (शत) को प्राप्ति तथा भिक्षुक का दर्शन होता है।
दक्षिण दिशा के प्रथम भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो राजकुमार कर दर्शन, कार्यों की सिद्धि और अभी अर्थ की प्राप्ति होती है। द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो खी और धर्म एवं सरसों और जी को भी प्राप्ति होती है।
आग्नेय कोण से चतुर्थ भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो पूर्व में नष्ट द्रव्य का लाभ होता है। गमन करने वाला गमनकाल में जो कुछ फल होता है, उसको जिस- किसी भी प्रकार से प्राप्त करता है।
दक्षिण भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो यात्रा की सिद्धि तथा मयूर, भैंस और मुर्गे को प्राप्ति होती है। दक्षिण भाग से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो चारण (नट-नर्तक) के साथ संयोग तथा शुभ कार्य और धर्मादि की प्राप्ति को सूचित करता है।
तृतीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो कार्यों की सिद्धि, कैवर्च का संयोग तथा मजली और शीतर की प्राप्ति होती है। चतर्थ भाग में स्थित शकन कोलाहल करे
नैऋत्य कोण में स्थित शकुन फोलाहल करे तो खो, घोड़ा, भूषण, दूत और लिखो हुई वस्तु की प्राप्ति होती है। नैऋत्य कोण से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो चर्मशिल्पी का दर्शन और चमड़े से निर्मित भाण्ड आदि का लाभ होता है।
नैर्ऋत्य कोण से तृतीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो वानर, भिक्षुक और बौद्ध संन्यासी का दर्शन होता है। नैऋत्य कोण से चतुर्थ भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो फल, पुष्प तथा दाँत से बनी हुई वस्तु की प्राप्ति होवो है ।
पश्चिम दिशा में स्थित शकुन कोलाहल करे तो समुद्र से उत्पन्न रत्न, वैदूर्य मणि और रत्नों से बनाये हुये भाण्डों की प्राप्ति होती है। पश्चिम दिशा से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो भील, व्याध और चोरों का संग तथा मांस का लाभ होता
पश्चिम दिशा से तृतीय भाग में स्थित शकुर कोलाहल करे तो वातरोगियों का दर्शन तथा चन्दन और अगर की प्राप्ति होती है। पश्चिम दिशा से चतुर्थ भाग में स्थित शकुन फोलाहल करे तो शाख और पुस्तक की प्राप्ति तथा इन वस्तुओं को बेचने वाले से मुलाकात होती है।
वायव्य कोण में स्थित शकुन कोलाहल करे तो समुद्रफेन, चामर और ऊनी वख की प्राप्ति तथा कायस्थ जाति के मनुष्य से समागम होता है। वायव्य कोण से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो मिट्टी के भाण्ड का लाभ, नग्नाचार्य से संयोग और डिण्डिभाण्ड (पटह, मृदङ्ग आदि वाद्यविशेष) का लाभ होता है।
वायव्य कोन से तृतीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो मित्र से समागम और धन की प्राप्ति होती है। वायव्य कोण से चतुर्थ भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो बस्त्र और घोड़े की प्राप्ति तथा प्रिय मित्रजन का ममागम होता है।
उत्तर दिसा में स्थित शकुन कोको दीक्ल और खोलों (लामा) की प्रतिसाद है। उत्तर दिशा में द्वितीयाद में स्थित शकुन कोलाहल को धन की प्राप्ति और के साथ समागम होता है।
उत्तर दिशा से तृतीय भाग में स्थित सकुन कोलाहल करे तो वेश्या, ब्राह्मण और मृत्य का समागम तथा सफेद फूलों का लाभ होता है। उत्तर दिशा से चतुर्थ भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो चित्रकार का दर्शन और चित्र बलों का लाभ होता
ईशान कोण में स्थित शकुन कोलाहल करे तो देवतक (पुजारी आदि) के साथ समागम तथा धान्य, रत्न और पशुओं का लाभ होता है। पूर्व के प्रथम भाग (ईशान कोण से द्वितीय भाग) में स्थित शकुन कोलाहल करे तो वस्त्र की प्राप्ति और वेश्या के साथ समागम होता है।
इंसान कोण से तृतीय भाग में स्थित छकुन कोलाहल करे तो धोनी के साथ समागम और जल में उत्पत्र द्रव्य का लाभ होता है। ईशान कोण से चतुर्थ भाग में नियत सकुन कोलाहल करे हो हाथी से जीविका करने वाले के साथ समागम तथा उससे धर और हाथी का लाभ होता है।
वास्तु की तरह नेमि के साथ यह बत्तीस से विभक्त दिक्चक्र कहा गया है। अब अर ( चक्र के मध्यवत्तों भाग) और नाभि (मध्य भाग) के मध्य में स्थित शकुन के द्वारा नव प्रकार से फल की कल्पना करनी चाहिये।
यदि नाभिस्यान में स्थित शकुन हो तो बन्धु और मित्रों के साथ समागम तया उत्तम तुष्टि का लाभ होता है। यदि पूर्व भागस्थित भर में शकुन हो तो लाल बरत्र का लाभ और राजा के साथ समागम होता है।
यदि आग्नेय कोण के जा में राकुन हो तो जुलाई, कारीगर या गणित के परिकों को जानने वाले पोदा सही इनके साथ सम्म तथा हुन् लोगों के बनाये हुये द्रच्यों का या घोड़े कर साप होता है।
चक्र की नेमि (प्रान्त) और नाभि के भाग को जानकर दक्षिण में जो अर हो, उसमें स्थित शकुन हो तो धार्मिक मनुष्यों के साथ समागम और धर्म का लाभ होता है।
यदि नैऋत्य कोण के अर में स्थित शकुन हो तो गाय, खेलने वाला और कापालिक के साथ समागम, बैल का लाभ तथा उड़द, कुलथी आदि भोजन का लाभ होता है।
यदि पश्चिम दिशा के आर में स्थित शकुन हो तो किसानों के साथ समागम था समुद्र में उत्पत्र द्रव्य, करच ( भिविशेष), फल और मद्य का लाभ होता है।
यदि वायव्य कोण के अर में स्थित शकुन हो तो भार ढ़ोने वाले, बढ़ई और भिक्षुक का दर्शन तथा तिलक, नाग, पुत्राग- इसके फूलों का लाभ होता है।
उत्तर दिशा के अर में स्थित शकुन हो तो धन का लाभ तथा वैष्णव, ब्राह्मण और पीले बत्र के साथ समागम होता है।
यदि ईशान कोण के अर में स्थित शकुन हो तो जत करने वाली स्त्री का दर्शन तथा करता एकोडा, शरत्र और घण्टों का लाभ होना है।
प्रदक्षिणक्रम से दक्षिण के आठवें, पक्षिम के दूसरे, छठे, तीसरे, साठवें और 'आठवें तथा उत्तर के दूसरे अष्टमांश में शाना सकुन हो तो मध्यम फल वाली यात्रा होती है। शेष पच्चीस अष्टमांशों में शुभ फल देने बाली यात्रा होती है।
नाभि के मध्य में वायव्य और नैर्द्धस्य को छोड़‌कर शेष छ: अरों में शकुन हो तो सुभ फल देने बाली तथा आयव्य और नैर्भूत्य कोण के अरों में स्थित शकुन हो तो क्लेश देने वाली यात्रा होती है।
ये पूर्वकथित समस्त फल खान्त दिशाओं के कहे गये है। अब दीप्त दिशाओं के फल कहता हूँ। यदि दोप्न पूर्व दिशा में स्थित शकुन हो तो राजा का भय और शत्रुओं के साथ समागम होता है।
यदि पूर्व दिशा के द्वितीय भाग में दप्तर से जो सोने का नाम और स्वर्णकार शकुन हो तो पन का नाश, काय को पथ होता है। पूर्व दिशा के सुलभा में और
यदि पूर्व दिशा के चतुर्थ भाग (अग्निकोण) में स्थित दीप्त शकुन हो तो अग्नि और चोरों का भय होता है। अग्निकोण से द्वितीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हसे हो धनक्षय और राजपुत्र का नारा होता है।
आग्नेय कोण से तृतीय भाग में स्थित दीप्त सकुन हो तो खो के गर्भ का नारा होला है। आग्नेय कोण से चतुर्थ भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो स्वर्णकार और मित्रकार का नारा दथा सत्रकोप होता है।
आग्नेय कोण से पश्चम भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो राजा का भय तथा मरको और मूत पुरुषों कर दर्शन होता है। आग्नेय कोण से पाठ भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो दोम और गन्धों का भय होता है।
यदि आग्नेय कोण से सप्तम भाग में स्थित दीपा शकुन हो तो धीवर और पंक्षी मारने वालों का भय होता है। आग्नेय कोण से आष्टम भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो भोजन का नाश और नग्न संन्यासी का भय होता है।
अपराये धर्मकृतं विनश्यते नैन्य कोण में स्थित दीप्त शकुन हो तो राय और अग्निकोप होता है। पश्चिम दिशा के प्रथम भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो चमड़े के चने हुये जूते, वरष आदि का नाश और चर्मकार से भय होता है।
यदि पश्चिम दिशा के द्वितीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो तपस्वी और बौद्ध संन्यासी का भय, तृतीय भार में स्थित हो तो उपवास का भय, ठीक पश्चिम में स्थित हो तो वृष्टि का भय तथा पसे भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो कुत्ते और चोरों का भम होता है।
यदि पश्चिम दिशा के पष्ठ भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो वातरोगियों का नाश, सप्तम भाग में स्थित हो तो शत और पुस्तकों से जीविका करने वालों का नाश, वायव्य कोण में स्थित हो तो शास्त्र का नाश तथा वायव्य कोण से द्वितीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो विष, चोर और वायु का भय होता है।
यदि वायव्य कोण से तृतीय युग में स्थित दीप्त शकुन हो तो धन का नाश और मित्रों के साथ कलह होता है। वायव्य कोण से चतुर्थ भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो घोड़े का मरण और पुरोहित को भय होता है।
ठीक उत्तर दिशा में स्थित दीप्त शकुन हो तो गायों को चोरी और शत्र का विनारा, उत्तर दिशा से द्वितीय भाग में व्यापारियों का विनाश और घन का नाश, उत्तर दिशा से तृतीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो ब्रात्य (आठ वर्ष से लेकर सोलह वर्ष के अन्दर उपनयन करने वाला), नृत्य और वेश्याओं को भय होता है।
यदि ईशान कोण के समीप (उत्तर दिशा से चतुर्थ भाग) में स्थित दीप्त शकुन हो तो चित्र बत्र और चित्र बनाने वाले का होता है। ईशान कोण में स्थित दीप्त शकुन हो तो अग्निभय और उत्तम रित्रयों में भी दोष होता है।
ईशान कोण के समीप में स्थित दीप्त शकुन हो तो दुःख की उत्पत्ति और स्त्री का नाश होता है। इससे आगे (ईशान कोण से तृतीय भाग में) स्थित दीप्त शकुन हो तो धोबी और गन्धर्वो का भय जानना चाहिये।
मण्डल की समाप्ति ( दिक्वक्र के अन्तिम भाग) में स्थित दीप्त शकुन हो तो हाथी पर चढ़ने वालों से भय और हाथी का मरण होता है। पूर्व दिशा के आभ्यन्तर (मध्य भाग) स्थित अर में स्थित दीप्त शकुन हो तो निश्चय ही त्री का मरण होता है।
आग्नेय कोणस्थित अर में दीप्त शकुन हो तो शरत्र और अग्नि का प्रकोप, घाड़ का नारा तथा शिल्पियों से भय होता है। दक्षिण-स्थित अर में दोप्त शकुन हो तो धर्म का नाश तथा नैऋत्य कोण-स्थित अर में दीप्त शकुन हो तो अग्नि, ऊपर गमन या दुष्ट के द्वारा मरण होता है।
पश्चिम भाग-स्थित अर में दीप्त शकुन हो तो कारीगरों को भय, वायव्य कोण-स्थित अर में दीप्त शकुन हो तो गदहे और ऊँटों का नाश तथा मनुष्यों को विसूचिका रोग और विष का भय होता है।
उत्तर-स्थित अर में दोप्त शकुन हो तो धन और ब्राह्मणों को पीड़ा, ईशान कोण-स्थित अर में दीप्त शकुन हो तो मन में सन्ताप, ग्रामीण और भोपजनों से पीड़ा तथा नाभि में स्थित दोप्त शकुन हो तो अपनो मृत्यु होती है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें