अपराये धर्मकृतं विनश्यते
नैन्य कोण में स्थित दीप्त शकुन हो तो राय और अग्निकोप होता है।
पश्चिम दिशा के प्रथम भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो चमड़े के चने हुये जूते, वरष
आदि का नाश और चर्मकार से भय होता है।
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