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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 1
ऐन्द्रयां दिशि शान्तायां विरुवन्नृपसंश्रितागमं वक्ति । शकुनः पूजालाभं णिरत्नद्रव्यसम्प्राप्तिम् ॥
यदि पूर्व दिशा में स्थित शकुन कोलाहल करे तो राजा के आश्रित पुरुष का आगमन तथा पूजा-लाभार्थ मणि और रत्नों की प्राप्ति को सूचित करता है। यदि वह शकुन शुभ हो तो उत्तम फल, मध्यम हो तो नध्यम फल और अशुभ हो तो किञ्चित् शुभ फल प्रदान करता है।
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