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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 18
द्वात्रिंशत्प्रविभक्तं दिक्चनं वास्तुवत्सनेम्युक्तम् । अरनाभिस्थैरन्तः फलानि नवधा विकल्प्यानि ॥
वास्तु की तरह नेमि के साथ यह बत्तीस से विभक्त दिक्चक्र कहा गया है। अब अर ( चक्र के मध्यवत्तों भाग) और नाभि (मध्य भाग) के मध्य में स्थित शकुन के द्वारा नव प्रकार से फल की कल्पना करनी चाहिये।
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