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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 28
अभ्यन्तरे तु नाभ्यां शुभफलदा भवति षट्‌सु चारेषु । वायव्यानैर्ऋतयोररयोः क्लेशावहा यात्रा ॥
नाभि के मध्य में वायव्य और नैर्द्धस्य को छोड़‌कर शेष छ: अरों में शकुन हो तो सुभ फल देने बाली तथा आयव्य और नैर्भूत्य कोण के अरों में स्थित शकुन हो तो क्लेश देने वाली यात्रा होती है।
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