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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 39
गोहरणशस्त्रघाताबुदक् परे सार्थघातधननाशी। आसन्ने च श्वभयं ब्रात्यद्विजदासगणिकानाम् ॥
ठीक उत्तर दिशा में स्थित दीप्त शकुन हो तो गायों को चोरी और शत्र का विनारा, उत्तर दिशा से द्वितीय भाग में व्यापारियों का विनाश और घन का नाश, उत्तर दिशा से तृतीय भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो ब्रात्य (आठ वर्ष से लेकर सोलह वर्ष के अन्दर उपनयन करने वाला), नृत्य और वेश्याओं को भय होता है।
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