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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 43
शस्त्रानलप्रकोपावाग्नेये वाजिमरणशिल्पिभयम् । याम्ये धर्मविनाशोऽ परे ऽग्न्यवस्कन्दचोक्षवधाः ॥
आग्नेय कोणस्थित अर में दीप्त शकुन हो तो शरत्र और अग्नि का प्रकोप, घाड़ का नारा तथा शिल्पियों से भय होता है। दक्षिण-स्थित अर में दोप्त शकुन हो तो धर्म का नाश तथा नैऋत्य कोण-स्थित अर में दीप्त शकुन हो तो अग्नि, ऊपर गमन या दुष्ट के द्वारा मरण होता है।
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