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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 45
उदगर्थविप्रपीडा दिश्यैशान्यां तु चित्तसन्तापः । ग्रामीणगोपपीडा च तत्र नाभ्यां तथात्मवधः ॥
उत्तर-स्थित अर में दोप्त शकुन हो तो धन और ब्राह्मणों को पीड़ा, ईशान कोण-स्थित अर में दीप्त शकुन हो तो मन में सन्ताप, ग्रामीण और भोपजनों से पीड़ा तथा नाभि में स्थित दोप्त शकुन हो तो अपनो मृत्यु होती है।
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