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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 42
हस्त्यारोहभयं स्याद् द्विरदविनाशश्च मण्डलसमाप्तौ । अभ्यन्तरे तु दीप्ते पत्नीमरणं ध्रुवं पूर्वे ॥
मण्डल की समाप्ति ( दिक्वक्र के अन्तिम भाग) में स्थित दीप्त शकुन हो तो हाथी पर चढ़ने वालों से भय और हाथी का मरण होता है। पूर्व दिशा के आभ्यन्तर (मध्य भाग) स्थित अर में स्थित दीप्त शकुन हो तो निश्चय ही त्री का मरण होता है।
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