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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 33
अय पश्चमे नृपभयं मारीमृत्तदर्शनं च वक्तव्यम् । षष्ठे तु भयं ज्ञेयं गन्धर्वाणां सडोम्यानाम् ॥
आग्नेय कोण से पश्चम भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो राजा का भय तथा मरको और मूत पुरुषों कर दर्शन होता है। आग्नेय कोण से पाठ भाग में स्थित दीप्त शकुन हो तो दोम और गन्धों का भय होता है।
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