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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 8
नैर्ऋत्यां खीलाभस्तुरगालङ्कारदूतलेखाप्तिः । परतोऽस्य चर्मतच्छित्पिदर्शनं चर्ममयलब्धिः ॥
नैऋत्य कोण में स्थित शकुन फोलाहल करे तो खो, घोड़ा, भूषण, दूत और लिखो हुई वस्तु की प्राप्ति होती है। नैऋत्य कोण से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो चर्मशिल्पी का दर्शन और चमड़े से निर्मित भाण्ड आदि का लाभ होता है।
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