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बृहत्संहिता • अध्याय 87 • श्लोक 12
वायव्ये फेनकचामरौर्णिकाप्तिः समेति कायस्थः । मृन्मयलाभोऽन्यस्मिन् वैतालिकडिण्डिभाण्डानाम् ॥
वायव्य कोण में स्थित शकुन कोलाहल करे तो समुद्रफेन, चामर और ऊनी वख की प्राप्ति तथा कायस्थ जाति के मनुष्य से समागम होता है। वायव्य कोण से द्वितीय भाग में स्थित शकुन कोलाहल करे तो मिट्टी के भाण्ड का लाभ, नग्नाचार्य से संयोग और डिण्डिभाण्ड (पटह, मृदङ्ग आदि वाद्यविशेष) का लाभ होता है।
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